Why Not Criticize Dead: मृत्यु के बाद निंदा क्यों वर्जित मानी गई है? भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में यह बात बार-बार दोहराई गई है कि जो व्यक्ति इस संसार से विदा हो चुका है, उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। घरों में बड़े-बुजुर्ग अक्सर समझाते हैं कि चाहे किसी इंसान ने जीवन में कितना भी कष्ट क्यों न दिया हो, उसकी मृत्यु के बाद उसके बारे में बुरा बोलना पाप माना जाता है। इस मान्यता के पीछे गहरे आध्यात्मिक और कर्म सिद्धांत से जुड़े कारण हैं, जिनका उल्लेख मनुस्मृति और अन्य प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
मनुस्मृति क्या कहती है मृत व्यक्ति की निंदा पर?
मनुस्मृति के अनुसार, मृत्यु के बाद भी व्यक्ति के साथ उसके कर्मों का संबंध बना रहता है। शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा की यात्रा जारी रहती है। ऐसे में मृत व्यक्ति की निंदा करना केवल उसी का अपमान नहीं, बल्कि अपने ही कर्मों को अशुद्ध करना माना गया है।
शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि किसी की निंदा करना—चाहे वह जीवित हो या मृत—एक घोर अपराध है। मान्यता है कि जो लोग मृत व्यक्ति का उपहास करते हैं या उसकी बुराई करते हैं, वे नकारात्मक कर्मों के भागी बनते हैं और आध्यात्मिक उन्नति से वंचित रह जाते हैं। (Why Not Criticize Dead)
निंदा करने से क्यों नहीं टूटता भावनात्मक बंधन?
कहा जाता है कि जब हम किसी मृत व्यक्ति की आलोचना करते हैं, तो उससे हमारा भावनात्मक संबंध समाप्त होने के बजाय और मजबूत हो जाता है।
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नकारात्मक भावनाएं मन में बनी रहती हैं
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क्रोध और द्वेष का प्रभाव हमारे कर्मों पर पड़ता है
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आत्मिक शांति भंग होती है
इसलिए शास्त्र सलाह देते हैं कि मृत्यु के बाद व्यक्ति से जुड़ी अच्छी स्मृतियों को ही याद किया जाए या फिर मौन धारण किया जाए।
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महाभारत और अन्य शास्त्रों में भी मिलता है प्रमाण
महाभारत के शांति पर्व में भी इस विषय का उल्लेख मिलता है। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को समझाया था कि मृत व्यक्ति का अपमान करने से मनुष्य की ऊर्जा नकारात्मक हो जाती है। यह भी कहा गया है कि व्यक्ति ने चाहे जीवन में कितने ही बुरे कर्म क्यों न किए हों, उसकी मृत्यु के बाद उसकी निंदा करने से कोई पुण्य नहीं मिलता। उल्टा, इससे स्वयं का चरित्र और मानसिक संतुलन प्रभावित होता है।
सभी धर्मों में समान संदेश
केवल हिंदू शास्त्र ही नहीं, बल्कि लगभग हर धर्म यह शिक्षा देता है कि मृत व्यक्ति के प्रति सम्मान और संयम बनाए रखना चाहिए। मृत्यु के बाद इंसान सांसारिक मोह-माया, द्वेष और अहंकार से ऊपर उठ जाता है। ऐसे में उसकी आलोचना करना आध्यात्मिक रूप से अनुचित माना गया है।















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