Martyrdom Day 2025: सिख धर्म के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी अपने त्याग, सहनशीलता और धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कभी किसी को सिख धर्म अपनाने के लिए प्रेरित नहीं किया, बल्कि हर व्यक्ति को सत्य, नैतिकता और मानवता के मार्ग पर चलने की सीख दी।
अमृतसर में जन्मे गुरु तेग बहादुर ने पंजाब से लेकर कश्मीर और बंगाल से लेकर बिहार-असम तक यात्राएं कीं। गुरु जी ने अपने जीवनभर अंधविश्वास का विरोध, शिक्षा का महत्व, और मानव अधिकारों की रक्षा को सर्वोच्च रखा। इसी कारण उन्हें पूरे भारत में ‘हिंद दी चादर’ यानी हिंदुओं की रक्षा की ढाल कहा जाता है।
हिंद दी चादर क्यों कहा गया?
1. कश्मीरी पंडितों की रक्षा में खड़े होने के कारण
- 1675 में औरंगजेब द्वारा कश्मीरी पंडितों पर जबरन धर्मांतरण का दबाव बढ़ा।
- परेशान होकर पंडित गुरु तेग बहादुर के दरबार पहुँचे।
- गुरु जी ने कहा— “अगर मेरा धर्म बदला जा सकता है, तो सबका बदला जा सकता है। अगर मेरा नहीं बदलेगा, तो किसी का नहीं बदलेगा।”
- उनकी यह बात उन्हें अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनाती है।
2. धर्म की स्वतंत्रता के रक्षक
- गुरु जी ने स्पष्ट कहा कि वे किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तित करने नहीं आए, बल्कि हर इंसान की आस्था की रक्षा करने आए हैं—चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान।
3. औरंगजेब का दबाव और शहादत
- जब औरंगजेब ने स्वयं गुरु जी पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाया, तो उन्होंने कहा— “मैं सिर दे सकता हूं, धर्म नहीं।”
- उन्हें शहीद कर दिया गया, लेकिन उन्होंने झुकना स्वीकार नहीं किया।
- इसीलिए भारतवर्ष में उन्हें ‘हिंद दी चादर’ कहा जाता है—एक ऐसी ढाल जिसने पूरे समाज की रक्षा की।
त्यागमल से गुरु तेग बहादुर कैसे बने?
1. जन्म और प्रारंभिक शिक्षा
गुरु तेग बहादुर का जन्म त्याग मल के रूप में अमृतसर में हुआ था। (Martyrdom Day 2025)
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पिता: गुरु हरगोबिंद साहिब (छठे गुरु)
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माता: नानकी उन्होंने धार्मिक शिक्षा भाई गुरदास जी से और शस्त्र शिक्षा भाई जेठा जी से प्राप्त की।
2. युद्ध में बहादुरी और नया नाम
- कर्तारपुर की लड़ाई के बाद मुगल सेना ने अचानक पलाही गाँव में गुरु हरगोबिंद साहिब पर हमला किया।
- त्याग मल ने अपने पिता के साथ बहादुरी से लड़ाई लड़ी और दुश्मनों को परास्त किया।
- उनके साहस और तलवार चलाने की क्षमता के कारण उन्हें नया नाम मिला— “तेग बहादुर” (तेग= तलवार, बहादुर= वीर)।
3. बीबी गुजरी से विवाह
- मार्च 1632 में उनका विवाह बीबी गुजरी से हुआ, जो जालंधर के करतारपुर निवासी भाई लाल चंद और माता बिशन कौर की पुत्री थीं।
सिखों के 9वें गुरु कैसे बने?
- सिख इतिहास के अनुसार, आठवें गुरु गुरु हरकृष्ण साहिब जी के देहांत के बाद मार्च 1665 में बकाला (अमृतसर के पास) में गुरु तेग बहादुर जी को गुरु की गद्दी प्रदान की गई।
- उस समय कई झूठे दावेदार भी सामने आए, पर सच्चे गुरु के रूप में उन्हें ही मान्यता दी गई।
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गुरु तेग बहादुर की विरासत
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धर्म की स्वतंत्रता के प्रतीक
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मानवाधिकारों के रक्षक
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अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस
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बलिदान और सत्य का संदेश
इसलिए वे सिर्फ सिखों के गुरु नहीं, बल्कि पूरे भारत की आत्मा और सम्मान के प्रतीक हैं।














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