Oil Price History: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब ग्लोबल ऑयल मार्केट पर साफ दिखाई देने लगा है। सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया और अमेरिकी क्रूड (WTI) व खाड़ी देशों का ब्रेंट क्रूड दोनों ही 119 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए। एक ही कारोबारी सत्र में कीमतों में करीब 30 प्रतिशत तक की तेजी देखी गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह उछाल मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और सप्लाई चेन में आई बाधाओं की वजह से आया है। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को बंद किए जाने से वैश्विक तेल सप्लाई का लगभग 20–25 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हो गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता कम हो गई है। आइए समझते हैं कि पिछले दो दशकों में कच्चे तेल की कीमतों का सफर कैसा रहा है और क्या फिर कभी ऐसा दौर आ सकता है जब तेल खरीदने पर खरीदारों को पैसे मिलें।
मिडिल ईस्ट युद्ध से क्यों बढ़ीं तेल की कीमतें?
मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। मौजूदा तनाव के कारण कई देशों ने तेल उत्पादन और सप्लाई में कटौती कर दी है।
मुख्य कारण:
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ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट बंद किया जाना
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कतर से एलएनजी शिपमेंट में कमी
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इराक और कुवैत द्वारा उत्पादन घटाना
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अन्य बड़े उत्पादकों द्वारा संभावित सप्लाई कटौती
इन घटनाओं के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कमी की आशंका बढ़ गई है, जिससे कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला।
2022: रूस-यूक्रेन युद्ध से 100 डॉलर के पार पहुंचा क्रूड
फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के बाद तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिली। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों से वैश्विक सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गईं।
मार्च 2022 में:
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ब्रेंट क्रूड लगभग 139 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया
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WTI क्रूड करीब 130 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचा
कोविड के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी से आई रिकवरी ने भी तेल की मांग को बढ़ा दिया, जिससे कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहीं। (Oil Price History)
2020: जब तेल खरीदने पर मिले थे पैसे
- साल 2020 तेल बाजार के इतिहास का सबसे असामान्य दौर माना जाता है।
- कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया भर में लॉकडाउन लग गए थे, फैक्ट्रियां बंद थीं और हवाई यात्रा लगभग ठप हो चुकी थी।
परिणाम:
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पेट्रोल और डीजल की मांग अचानक गिर गई
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स्टोरेज टैंक भर गए
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सप्लाई ज्यादा और मांग बेहद कम हो गई
अप्रैल 2020 में WTI क्रूड की कीमतें -40.32 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गईं। इसका मतलब था कि तेल उत्पादकों को खरीदारों को तेल लेने के बदले पैसे देने पड़े। उसी समय ब्रेंट क्रूड लगभग 16 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया था।
2012: ईरान पर प्रतिबंधों से बढ़ी कीमतें
2012 में अमेरिका और यूरोपीय देशों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों में ईरान के तेल निर्यात पर रोक भी शामिल थी।
इसके परिणामस्वरूप:
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वैश्विक बाजार में सप्लाई घटने का डर बढ़ा
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तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और सीरिया संघर्ष ने भी तेल बाजार को प्रभावित किया।
2011: अरब स्प्रिंग ने हिला दिया था तेल बाजार
2011 में मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका में शुरू हुए अरब स्प्रिंग आंदोलन ने तेल बाजार में भारी अस्थिरता पैदा कर दी थी।
उस दौरान:
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ट्यूनीशिया, मिस्र और यमन में सरकारें बदलीं
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लीबिया जैसे बड़े तेल उत्पादक देश में संघर्ष बढ़ गया
मार्च 2011 में ब्रेंट क्रूड करीब 127 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था।
2008: कच्चे तेल की सबसे बड़ी ऐतिहासिक तेजी
ऑयल मार्केट के इतिहास में सबसे बड़ा उछाल 2008 में देखा गया।
11 जुलाई 2008 को:
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ब्रेंट क्रूड 147.50 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया
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WTI क्रूड 147.27 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा
इस तेजी के पीछे कई कारण थे:
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अमेरिका में तेल स्टॉक की कमी
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चीन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से बढ़ती मांग
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तेल उत्पादक देशों में राजनीतिक अस्थिरता
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कमजोर अमेरिकी डॉलर
हालांकि उसी साल आई वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद दिसंबर 2008 तक कीमतें गिरकर 36 डॉलर प्रति बैरल तक आ गईं। (Oil Price History)
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1970 के दशक जैसा संकट दोबारा आ सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात कुछ हद तक 1970 के तेल संकट की याद दिलाते हैं।
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ओपेक देशों ने तेल उत्पादन कम कर दिया
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कई देशों को तेल सप्लाई रोक दी गई
इसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतें 3 डॉलर से बढ़कर 12 डॉलर प्रति बैरल हो गईं, यानी लगभग 300 प्रतिशत की वृद्धि। यह अब तक के इतिहास का सबसे गंभीर तेल संकट माना जाता है।
क्या फिर निगेटिव हो सकता है कच्चे तेल का भाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतें दोबारा निगेटिव होना बेहद दुर्लभ स्थिति होगी। ऐसा केवल तब संभव है जब:
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वैश्विक मांग अचानक खत्म हो जाए
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स्टोरेज क्षमता पूरी तरह भर जाए
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सप्लाई में कटौती न हो
हालांकि मौजूदा समय में हालात इसके उलट हैं — सप्लाई घट रही है और मांग स्थिर बनी हुई है। इसलिए फिलहाल तेल की कीमतों में गिरावट से ज्यादा तेजी की संभावना जताई जा रही है।















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